शनिवार, 14 अगस्त 2010

लहराएगा अमर तिरंगा इज्जत और इमान से !
टकरा लेंगे हम मत्बले हर आंधी तूफान से !!

खून पसीना देकर हमने इसका रंग सजाया है !
टकराया है जो भी हमसे आखिर में पछताया है !!
वीरन्द्र "कनक" चोलकर

रविवार, 8 अगस्त 2010

ख़ुमार बाराबंकवी

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए

भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए

आगाज़े-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए
अंजामे-आशिक़ी का मज़ा हमसे पूछिए

जलते दीयों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ
सरकार रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए

वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है
आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हमसे पूछिए

हँसने का शौक़ हमको भी था आप की तरह
हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए

हम तौबा करके मर गए क़ब्ले-अज़ल "ख़ुमार"
तौहीन-ए-मयकशी का मज़ा हमसे पूछिये

मंगलवार, 23 मार्च 2010

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता
‘इब्ने बतूता पहन के जूता,
निकल पड़े तूफान में,
थोड़ी हवा नाक में घुस गई,
घुस गई थोड़ी कान में।
कभी नाक को,
कभी कान को,
मलते इब्नेबतूता,
इस बीच में निकल पड़ा,
उनके पैरों का जूता।
उड़ते उड़ते जूता उनका,
जा पहुँचा जापान में,
इब्ने बतूता खड़े रह गए,
मोची की दुकान में।’’

सोमवार, 22 मार्च 2010

विष्णु सक्स्सेना द्वारा

थाल पूजा का लेकर चले आइये , मन्दिरों की बनावट सा घर है मेरा।

आरती बन के गूँजो दिशाओं में तुम और पावन सा कर दो शहर ये मेरा।


दिल की धडकन के स्वर जब तुम्हारे हुये


बाँसुरी को चुराने से क्या फायदा,

बिन बुलाये ही हम पास बैठे यहाँ

फिर ये पायल बजाने से क्या फायदा,

डगमगाते डगों से न नापो डगर , देखिये बहुत नाज़ुक जिगर है मेरा।


झील सा मेरा मन एक हलचल भरी

नाव जीवन की इसमें बहा दीजिये,

घर के गमलों में जो नागफनियां लगीं

फेंकिये रात रानी लगा लीजिये,

जुगनुओ तुम दिखा दो मुझे रास्ता, रात काली है लम्बा सफर है मेरा।


जो भी कहना है कह दीजिये बे हिचक

उँगलियों से न यूँ उँगलियाँ मोडिये,

तुम हो कोमल सुकोमल तुम्हारा हृदय

पत्थरों को न यूँ कांच से तोडिये,

कल थे हम तुम जो अब हमसफर बन गये, आइये आइये घर इधर है मेरा।

सोमवार, 1 मार्च 2010


विष्णु सक्सेना

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।

तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं।

मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया

ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये,

आस मन में लिये प्यास तन में लिये

कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये,

तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ, ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं।

मैं तो होली मना लूँगा सच मानिये

तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो,

मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा

तुम मुझे मेरे पँखों को आकाश दो,

उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम, यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं।

आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी

बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं,

जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में

मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी

कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो, मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

जब होता है कोई हम-दम होता है

जावेद अख़्तर
सच ये है बेकार हमें ग़म होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है

ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है

ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की
जब होता है कोई हम-दम होता है

ज़ख़्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है

ज़हन की शाख़ों पर अशार आ जाते
हैं जब तेरी यादों का मौसम होता है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

स्वेतान्त्र्ता दिवस पर


लहेरायेगा अमर तिरंगा इज्जत और इमान से !

टकरा लेंगे हम मतवाले हर अंधी तूफान से !!


खून पसीना देकर हमने इसका रंग सजाया है !

टकराया है जोभी हमसे आख़िर में पछताया है !!

वीरेंदर "kanak" चोलकर


गुरुवार, 30 जुलाई 2009

ग़लिब

Lyrics: Mirza ग़लिब
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया है मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।
होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे
होतेघिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे।
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे
पीछेतू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।
ईमान मुझे रोके है जो खींचे है मुझे
कुफ़्रकाबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे।
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।

रविवार, 21 जून 2009

तुम मुझे न यद् करना


तुम मुझे न यद् करना आँखे नम होजयेंगी !


ये सुधा के प्याले है कुछ बुँदे कम हो जाएँगी !!


कुछ सांसो का जीवन गुजरा कुछ और बाकि है !


नामतुम्हारा लेते लेते ये भी कम हो जाएँगी !!


वीरेंदर "kanak" चोलकर

रविवार, 24 मई 2009

दुष्यंत कुमार



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

मंगलवार, 19 मई 2009


भोपाल गैस त्रासदी को समर्पित
इस ताल तलैया की नगरी से १ दुखद हादसा गुजरा था !
इस स्वर्ग सी सुंदर नगरी से १ गमो का काफिला गुजरा था !!
मच गई थी उथल पुथल ,
और मौत तांडव करती थी !
जहर घुल गया था उस नगरी में ,
जीसे जन्नत सजदा करती थी !!
साँस घुटी थी आँखे थी बंद ,
बो बक्त मुस्किल का गुज़रा था!!
--------------१ दुखद हादसा गुजरा था !
होती है जब होली घर में ,
रंग गमो के बहते है
आता है कोई खुसी का पल
सब आंसू पी कर रहते !
सन्नाटा था चारो तरफ़ ,उस रात काल का पहरा था !!
--------------१ दुखद हादसा गुजरा था !
जब सोचेता हु मै इन बातो को,
आँख से आसूं बहते है!
मै तो हु १ पराया उनके परिजन,
इस दुःख को कायसे सहेते है!!
हो गया था तबाह ये चमन ,बो रूप मौत का दूसरा था !
--------------१ दुखद हादसा गुजरा था !
वीरेंदर "कनक"चोलकर

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

चंद शेर माँ के लिए ( मुन्नाबर राणा )

1

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

जब भी देखा मेरे किरदार पे धब्बा कोई
देर तक बैठ के तन्हाई में रोया कोई

माँ


माँ
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

मुनाबर राणा

रविवार, 26 अप्रैल 2009

पगली लड़की

पगली लड़की
कुमार विश्वास के दुआर
वन मोरे आसम क्रियेशन ऑफ द्र। कुमार विश्वास
पगली लड़की
अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसून के घुलता हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम नीपाट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चूक जाती हैं,
जब उंच-नीच समझने में माथे की नस दुख जाती हैं,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब पोते खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं, जब ग़ज़लें रास नहीं आतीं,
अफ़साने गाली होते हैं।
जब बासी फीकी धूप समेटें दीं जल्दी ढाल जाता है,
जब सूरज का लसखर च्छाट से गलियों में देर से जाता है, जब जल्दी घर जाने की इच्छा मान्न ही मान्न घुट जाती है,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख माना करने पर भी पारो पढ़ने जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनाई देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे झाई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुच्छ सेहत का भी ध्यान करो, क्या लिखते हो दिनभर, कुच्छ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुच्छ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हूमें बुलाते हैं, हम जाते हैं, घबराते हैं,
जब सारी पहने एक लड़की का एक फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हूमें मानती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझना हूमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।
दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कुच्छ औकात नहीं,
उसके दिल में भैया तेरे जैसे प्यारे जसबाट नहीं,
वो पगली लड़की नौ दीं मेरे लिए भूकी रहती है,
चुप-चुप सारे व्रत करती है, पर मुझसे कभी ना कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन में हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुच्छ अधिकार नहीं बाबा,
यह कथा-कहानी किस्से हैं, कुच्छ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के भीं मरना भी भारी लगता है

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

रूठा है !

दिलबर मेरा जबसे मुझसे रूठा है !

गीत ग़ज़ल से जैसे रिश्ता टुटा है !!

वीरेंद्र "कनक" चोलकर

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

तन्हा

तुझसे तन्हा होकर हम तन्हाई में खोये है !

पलकों ने पोछे है आसूं जब जब भी हम रोये है !!

दिल के दर्द को दिल ही जाने और कोई क्या जाने गा !

हम तो अपने दिल के साथ फुट फुट कर रोये है !!

वीरेन्द्र "कनक" चोलकर

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

पल पल मुझे मौत आती रही !

जिन्दगी भी मुझे यूँ श्ताती रही !!

कभी मर गये हम कभी जी उठे !

मौते आती रही मौते जाती रही !!

आपने आगोसे में लेन की चाह से !

मौते भी आपनी बाहे फेयेलाती रही !!

वीरेंद्र "कनक" चोलकर

मंगलवार, 31 मार्च 2009

बुधवार, 25 मार्च 2009

खामोसे आँगन

बड़ा खामोश आँगन है , जरा पायल तो छान्काओ!


थोडी बेचेनी है दिल में जरा इस दिल को समझाओ !!




कहा था क्या अभी तुमने उसे मै सुन नही पाया !


मरी हर बात बन जाए जो तुम वो बात दोहराओ !!

खाली हो जब दिल का कई गम घर बनते है !


मेरा हर गम जो तुम इस दिल में बस जाओ !!




तारे होतो को गालो को तेरे बालो को क्या देखू !


मेरी धड़कन ना रुक जाए मुझे इतना ना तड़पाओ !!


विरेन्द्र "कनक" चोलकर

रविवार, 22 मार्च 2009

तुजसे तनहा होकर हम तन्हाई में खोये हाई पलकों ने पोछे है आशू जब जब भी हम रोये है